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Tuesday, 28 February 2017

बेटियाँ!!

वैसे तो अक्सर मैं मेरी एक ही तयशुदा बस से ही सफ़र तय करती हूँ फिर भी कभी-कभार इमरजेंसी में बसें भी बदलनी पड़ जाती हैं तो मैंने उन्हें किराया पूरा दिया हैं उन्होंने पूछा हैं पढ़ने जाती हो, पढ़ने वाली लड़कियों का वो आधा किराया लेते हैं मैंने कोई लालच नहीं किया हैं बस मुस्कान दी हैं एक प्यार से फिर सोचने लगी हूँ अब तो बढ़ेगी ही मेरे देश की बेटियाँ...अब तो पढेगी ही नन्ही जान!!
मतलब हर जगह हैं मौका ताड़ लेना लाडो!!
पढ़ेगी बेटियाँ, बढ़ेगी बेटियां!! :)😍👍✌

1 comment:

राकेश कुमार श्रीवास्तव राही said...

आपकी लिखी रचना "मित्र मंडली" में लिंक की गई है http://rakeshkirachanay.blogspot.in/2017/03/9.html पर आप सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद